हाय दोस्तों! आज मैं अपनी छोटी-सी ब्लॉगिंग जर्नी में एक टॉपिक लेकर आया हूँ ‘भाषा समाज को कैसे प्रभावित करती है।’ सच बताऊँ तो पहले मुझे कभी इस बारे में इतना गहराई से सोचने का मौका नहीं मिला था। बस रोज़ बोलते रहते हैं, चैट करते हैं, गाना सुनते हैं, लेकिन कभी ध्यान नहीं दिया कि ये भाषा हमारे आस-पास की दुनिया को कितना बदल देती है। तो चलो आज इसी चीज़ को थोड़ा आसान तरीके से समझने की कोशिश करते हैं।

सबसे पहले तो ये समझ लो कि भाषा क्या होती है भाई। भाषा वो तरीका है जिससे हम अपनी बात दूसरों तक पहुँचाते हैं चाहे वो शब्द बोलकर हों, लिखकर हों या फिर सिर्फ़ इशारों से। दुनिया में ढेर सारी भाषाएँ हैं हिंदी, इंग्लिश, तमिल, बंगाली, चाइनीज़… हर एक का अपना अलग मज़ा है। कोई बहुत मीठी लगती है, कोई थोड़ी कठिन, कोई बहुत तेज़।
अब असली बात ये है कि भाषा सिर्फ़ बात करने का साधन नहीं है, ये पूरे समाज को आकार देती है। अगर सब लोग एक ही भाषा बोलें तो उनकी पुरानी परंपराएँ, कहानियाँ, गीत सब आसानी से अगली पीढ़ी तक पहुँचते रहते हैं। लेकिन जैसे ही भाषा में बदलाव आता है, समाज भी धीरे-धीरे बदलने लगता है। मेरे गाँव में देखो ना, बड़े-बुजुर्ग अभी भी पूरी शुद्ध हिंदी में बात करते हैं, पर हम नई वाली पीढ़ी इंग्लिश के शब्द मिलाकर बोलती है – “भाई क्या scene है”, “मस्त vibe है” वगैरह। ये छोटी-छोटी चीज़ें ही समाज को नया रूप दे रही हैं।
भाषा और सामाजिक पहचान:
भाषा से पता चलता है कि हम असल में कौन हैं। मतलब जब कोई बोलता है तो उसकी भाषा से ही लग जाता है कि वो कहाँ का है, उसका बैकग्राउंड क्या है। जैसे भारत में अगर कोई प्योर हिंदी बोल रहा है तो ज्यादातर लोग समझ लेते हैं कि ये उत्तर भारत से है। वहीं अगर कोई तमिल या मलयालम में बात करे तो साउथ इंडिया वाला लगता है। ये भाषा हमें एक ग्रुप से जोड़ती है, जैसे एक बड़ा परिवार। सब एक जैसी भाषा बोल रहे हैं तो लगता है हम सब एक ही हैं, एकदम घर जैसा फील आता है।
लेकिन वही भाषा कभी-कभी दूरियाँ भी बना देती है। मेरे स्कूल में देखा था ना, हिंदी मीडियम वाले बच्चे आपस में अलग खेलते थे और इंग्लिश वाले भी अलग। जैसे दो अलग-अलग दुनिया। कभी-कभी तो ऐसा लगता था कि दोनों ग्रुप एक-दूसरे से बात ही नहीं करना चाहते।
और हाँ, बचपन में जो भाषा घर में सीखी जाती है, वही हमारी सबसे मजबूत पहचान बन जाती है। मेरे घर में तो सब हिंदी बोलते हैं, इसलिए मुझे आज भी लगता है कि ये मेरी असली भाषा है। लेकिन स्कूल में इंग्लिश पढ़ाई जाती है तो कभी-कभी दिमाग में कन्फ्यूजन हो जाता है मैं कौन सा कल्चर ज्यादा फॉलो करूँ?
फिर कुछ जगहों पर भाषा से ही लोगों को जज किया जाता है। इंग्लिश अच्छी बोल लेते हो तो सब बोलते हैं “अरे वाह, बहुत स्मार्ट है ये!” लेकिन अगर सिर्फ़ लोकल भाषा आती है तो लोग हल्के में ले लेते हैं। मेरे एक दोस्त को तो लोग मजाक में “गाँव वाला” बोलकर चिढ़ाते हैं सिर्फ़ इसलिए कि उसकी हिंदी थोड़ी अलग है। ये सब सुनकर बुरा लगता है यार।
और हाँ, भाषा से सोशल स्टेटस का भी बहुत कनेक्शन है। अमीर लोग अक्सर इंग्लिश या कोई फॉरेन लैंग्वेज सीख लेते हैं और वो उन्हें हाई-क्लास वाला फील कराता है। वहीं गरीब परिवार वाले ज्यादातर अपनी लोकल भाषा में ही रह जाते हैं। मेरे अंकल जी को तो सिर्फ़ हिंदी आती है और वो कहते हैं कि अब तो सब इंग्लिश की दुनिया हो गई है, हम तो पीछे रह गए। इससे समाज में एक तरह की असमानता बढ़ जाती है और लोग एक-दूसरे से जलने भी लगते हैं।
भाषा और संचार:
दोस्तों, संचार तो समाज की जान है ना! बिना इसके तो कुछ भी नहीं चल सकता। और संचार का सबसे बड़ा ज़रिया है भाषा। सोचो, अगर भाषा न हो तो हम एक-दूसरे से कैसे बात करेंगे? कैसे अपनी फीलिंग्स बताएंगे? घर में मम्मी-पापा से स्कूल की बातें शेयर करना, दोस्तों से मस्ती करना, सब भाषा से ही तो होता है। जब सब लोग एक ही भाषा में बात करते हैं, तो समझने में बहुत आसानी हो जाती है। क्लास में सब हिंदी में चिल्ला-चिल्ला के बात करें तो कितना मज़ा आता है, कोई मिसअंडरस्टैंडिंग नहीं होती।
लेकिन जब भाषाएँ अलग-अलग होती हैं, तो दिक्कत शुरू हो जाती है। जैसे कोई इंटरनेशनल मीटिंग में बैठे हों और सबकी अलग-अलग भाषा हो, तो ट्रांसलेटर के बिना तो कुछ समझ ही नहीं आता। मैंने कभी-कभी देखा है कि दो लोग अलग भाषा बोल रहे हैं और दोनों एक-दूसरे को गलत समझकर नाराज़ हो जाते हैं।
फिर बात आती है शब्द चुनने की। यार, शब्द बहुत पावरफुल होते हैं। अगर कोई गुस्से में गंदे शब्द बोल दे तो दोस्ती टूट सकती है। लेकिन अगर प्यार से, मीठे शब्दों में बात करो, जैसे “भाई तू कमाल है” या कोई अच्छा कम्प्लिमेंट दो, तो लोग पास आते हैं, बॉन्ड मज़बूत होता है।
मीडिया में भी भाषा बहुत बड़ा रोल निभाती है। न्यूज़, टीवी, अखबार सब भाषा से ही फैलते हैं। अगर भाषा सिंपल और आसान हो तो हर कोई समझ लेता है, लेकिन अगर बड़े-बड़े मुश्किल शब्द यूज करें तो सिर्फ पढ़े-लिखे लोग ही समझ पाते हैं। मैं तो कई बार न्यूज़ पढ़ते वक्त ऐसे शब्द देखकर स्किप कर देता हूँ, क्योंकि दिमाग काम नहीं करता। इससे जानकारी सब तक बराबर नहीं पहुँच पाती।
अब डिजिटल ज़माने में तो भाषा और भी बदल गई है। सोशल मीडिया पर लोग छोटे-छोटे मैसेज भेजते हैं, इमोजी डालते हैं, शॉर्टकट यूज करते हैं। ये सब बहुत फास्ट और कूल लगता है। लेकिन कभी-कभी एक गलत कमेंट या ट्रोलिंग से लड़ाई हो जाती है। ऑनलाइन बुलिंग भी इसी से होती है। मुझे तो खुद कभी-कभी लगता है कि मैं बिना सोचे बहुत कुछ टाइप कर देता हूँ। इसलिए सोचना चाहिए कि हमारी भाषा किसी को ठेस न पहुँचाए।
भाषा का शिक्षा पर प्रभाव:
एजुकेशन तो समाज को आगे बढ़ाने का सबसे बड़ा तरीका है। और भाषा एजुकेशन को बहुत प्रभावित करती है। स्कूल में जो भाषा पढ़ाई जाती है, वो बच्चों के सीखने पर सीधा असर डालती है। मेरे साथ तो पहले साल ऐसा हुआ था – घर पर हिंदी, स्कूल में पूरा इंग्लिश। दिमाग घूम जाता था, समझ ही नहीं आता था। ऐसे में बच्चे पीछे रह जाते हैं और आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। इससे समाज में अमीर-गरीब, शहर-गाँव वाली असमानता और बढ़ जाती है।
कुछ स्कूल्स और देशों में लोकल भाषा में पढ़ाई होती है, जो बच्चों को बहुत आराम देती है। जैसे हमारे यहाँ कुछ जगहों पर हिंदी या राज्य की भाषा में क्लास होती है, तो बच्चे अच्छे से समझ पाते हैं।
भाषा ही तो नॉलेज का रास्ता है। किताबें, टीचर की बातें, सब भाषा से आते हैं। अगर भाषा आसान हो तो पढ़ना मजेदार लगता है, लेकिन अगर मुश्किल शब्दों से भरी हो तो नए बच्चे डर जाते हैं। मैं तो मैथ्स की किताबें देखकर ही कन्फ्यूज हो जाता हूँ।
फिर आगे चलकर अच्छी भाषा जानने वाले लोगों को अच्छी नौकरियाँ मिलती हैं। जो सिर्फ लोकल भाषा जानते हैं, वो कई बार पीछे रह जाते हैं। गाँव के बहुत सारे बच्चे इसी वजह से अच्छे मौके नहीं पा पाते।
और हाँ, भाषा से कल्चर भी सीखा जाता है। पुरानी कहानियाँ, कविताएँ, लोकगीत सब अपनी भाषा में ही अच्छे लगते हैं। अगर भाषा बदल गई तो वो पुरानी चीज़ें धीरे-धीरे गायब हो सकती हैं। इसलिए मुझे लगता है कि शिक्षा में भाषा का बैलेंस रखना बहुत ज़रूरी है, ताकि सब बच्चों को बराबर मौका मिले। अनफेयर तो नहीं होना चाहिए ना!
भाषा और राजनीति:
यार राजनीति में भाषा का खेल तो सबसे बड़ा होता है! नेता लोग कितनी प्यारी-प्यारी भाषा में बात करते हैं, मीठे वादे करते हैं, तो लोग सोचते हैं अरे ये तो हमारा आदमी है, वोट दे देते हैं। आजादी के समय में देखो, गांधी जी और बाकी नेताओं ने हिंदी में बात करके पूरे देश को एक किया था। भाषा से ही लोग एकजुट हो गए थे।
लेकिन वही भाषा कभी-कभी झगड़े भी पैदा करती है। कुछ पार्टियाँ तो सिर्फ भाषा के नाम पर वोट मांगती हैं “हमारी भाषा को बचाओ”, “ये भाषा खतरे में है” ऐसे बोलकर लोगों को भड़काते हैं। फिर समाज में टेंशन, मारपीट, सब बढ़ जाता है। मुझे तो ये सब देखकर बहुत बुरा लगता है।
कानून, पॉलिसी सब भाषा में ही लिखे जाते हैं। अगर वो भाषा आम आदमी की समझ से बाहर हो, जैसे सिर्फ इंग्लिश में, तो लोग समझ ही नहीं पाते कि उनके साथ क्या हो रहा है। फिर गुस्सा आता है, प्रदर्शन होते हैं।
इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में भी ज्यादातर इंग्लिश चलती है, तो जिन देशों की इंग्लिश अच्छी है, उन्हें फायदा हो जाता है, बाकी थोड़े कमज़ोर पड़ जाते हैं।
प्रचार में भी शब्दों का बहुत असर होता है। पॉजिटिव और उम्मीद भरे शब्द बोलो तो लोग साथ देते हैं, नेगेटिव बोलो तो विरोध। नेता इसी से जनता को कंट्रोल करते हैं, जैसे कोई जादू। मैं तो बस यही सोचता हूँ कि हमें ऐसी भाषा यूज करनी चाहिए जो लोगों को जोड़े, न कि उनमें फूट डाले।
भाषा का सांस्कृतिक प्रभाव:
दोस्तों, संस्कृति और भाषा तो एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं, सच में! हमारी सारी कहानियाँ, गाने, त्योहार, रस्में सब कुछ भाषा में ही जीवित रहती हैं। मेरे घर में दादी जी शाम को बैठकर पुरानी हिंदी कहानियाँ सुनाती हैं, जैसे पंचतंत्र की बातें या रामायण के किस्से। सुनते-सुनते लगता है कि हमारी पुरानी संस्कृति अभी भी साँस ले रही है। अगर भाषा मजबूत रहेगी, तो कल्चर भी हमेशा जिंदा रहेगी। लेकिन अब ग्लोबलाइजेशन की वजह से इंग्लिश हर तरफ़ फैल रही है। मेरे क्लास में देखो, कई बच्चे अब सिर्फ़ इंग्लिश में बात करते हैं, हिंदी तो जैसे भूलते जा रहे हैं। कभी-कभी डर लगता है कि कहीं हम अपनी असली पहचान ही खो न दें।
फिर भाषा से संस्कृति का आदान-प्रदान भी बहुत होता है। अनुवाद करके एक देश की कहानी दूसरे देश तक पहुँच जाती है, बहुत अच्छा लगता है। जैसे कोई अच्छी हिंदी किताब इंग्लिश में पढ़ी तो नया मजा आता है। लेकिन कभी-कभी अनुवाद में बात का असली मतलब ही बदल जाता है, और वो मजा खराब हो जाता है। कुछ भाषाओं में तो लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग शब्द होते हैं, जो सोच में थोड़ा भेदभाव डाल देते हैं। फिल्में, किताबें, गाने – सब भाषा से ही बनते हैं। अगर भाषा बदल गई, तो पुरानी वैल्यूज और सोच भी धीरे-धीरे बदल सकती है। इसलिए मुझे लगता है कि हमें अपनी भाषा की अच्छे से केयर करनी चाहिए। ताकि हमारी संस्कृति हमेशा जिंदा रहे। वरना सब कुछ एक जैसा हो जाएगा, और दुनिया कितनी बोरिंग लगने लगेगी ना!
भाषा का वैश्विक प्रभाव:
अब तो ग्लोबलाइजेशन ने भाषा के असर को और भी बड़ा कर दिया है। इंटरनेट पर सब कुछ मिक्स हो रहा है। लोग हिंदी में भी इंग्लिश के शब्द डाल देते हैं “भाई क्या scene है”, “मस्त vibe है यार” ये सब सुनकर मज़ा आता है। इंग्लिश अब पूरी दुनिया की कॉमन भाषा बन गई है। इससे नए-नए आइडियाज, नई चीज़ें सीखने को मिलती हैं, बहुत अच्छा लगता है। लेकिन साथ ही अपनी लोकल भाषाएँ थोड़ी दब सी जाती हैं। ग्लोबल बिजनेस में जो इंग्लिश अच्छी बोल लेता है, वो आसानी से आगे निकल जाता है, और बाकी लोग थोड़े संघर्ष करते रहते हैं।
वैज्ञानिक रिसर्च, बड़े-बड़े पेपर ज्यादातर इंग्लिश में ही होते हैं। तो जो दूसरी भाषा बोलते हैं, उन्हें थोड़ा पीछे रहना पड़ सकता है। लेकिन अब गूगल ट्रांसलेट जैसे टूल्स हैं, वो बहुत मदद कर रहे हैं। थैंक गॉड! इससे लगता है कि हमें भाषाओं की वैरायटी को बचाना चाहिए। सब कुछ एक जैसा नहीं होना चाहिए। विविधता ही तो दुनिया को इतना खूबसूरत बनाती है। मुझे तो यही लगता है कि अलग-अलग भाषाएँ, अलग-अलग कल्चर यही सबसे अच्छी बात है!
निष्कर्ष:
तो दोस्तों, भाषा समाज का बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा है। ये हमारी आईडेंटिटी बनाती है, कम्युनिकेशन को आसान बनाती है, एजुकेशन देती है, राजनीति में रोल निभाती है, संस्कृति को बचाए रखती है और पूरी दुनिया को जोड़ती भी है। हमें भाषा का अच्छे से इस्तेमाल करना चाहिए, ताकि समाज और मजबूत बने। अलग-अलग भाषाओं का सम्मान करेंगे, तो दुनिया और भी सुंदर और खुशहाल हो सकती है। आखिर में भाषा सिर्फ़ शब्दों का ढेर नहीं होती, ये तो समाज की पूरी बुनियाद है।
मुझे ये सब लिखते हुए बहुत मज़ा आया यार! उम्मीद है तुम्हें भी पढ़कर अच्छा लगा होगा। क्या कहते हो? कमेंट में बताना कि तुम्हारी भाषा तुम्हारे लिए क्या मायने रखती है!
